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Achievement: सिर से उठा पिता का साया! मां ने नहीं टूटने दिया हौसला, अब हिमाचल के पहले नेत्रहीन वकील बने लग्नेश!

Achievement: सिर से उठा पिता का साया! मां ने नहीं टूटने दिया हौसला, अब हिमाचल के पहले नेत्रहीन वकील बने लग्नेश!

Achievement: सिर से उठा पिता का साया! मां ने नहीं टूटने दिया हौसला, अब हिमाचल के पहले नेत्रहीन वकील बने लग्नेश!

Achievement: सिर से उठा पिता का साया! मां ने नहीं टूटने दिया हौसला, अब हिमाचल के पहले नेत्रहीन वकील बने लग्नेश!

Achievement: कहते हैं कि मजबूत इरादे, निरंतर परिश्रम और आत्मविश्वास के सामने संसाधनों की कमी भी बाधा नहीं बन पाती। इस कहावत को चरितार्थ कर दिखाया है जिला बिलासपुर के घुमारवीं उपमंडल के बरोटा गांव के लग्नेश कुमार ने, जोकि हिमाचल के पहले नेत्रहीन वकील बने है।

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Achievement: सिर से उठा पिता का साया! मां ने नहीं टूटने दिया हौसला, अब हिमाचल के पहले नेत्रहीन वकील बने लग्नेश!

सीमित संसाधनों और शारीरिक चुनौती के बावजूद लग्नेश ने अपनी मेहनत और लगन के बल पर यह उपलब्धि हासिल कर न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे क्षेत्र का मान बढ़ाया है। लग्नेश कुमार ने बताया कि यहां तक पहुंचना उनके लिए किसी सपने से कम नहीं है।

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इसके लिए उन्होंने कई चुनौतियों को पार किया है और आज जब इस मुकाम को हासिल किया तो न केवल उनकी बल्कि उनके परिवार की आंखें भी खुशी से भर आई।

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2020 में हासिल की थी एलएलबी की डिग्री
लग्नेश ने स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद 2016 में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। जिसके बाद उन्होंने केक फाउंडेशन की सहायता से देश के प्रतिष्ठित संस्थान दिल्ली विश्वविद्यालय (कैंपस लॉ सेंटर) से 2020 में एलएलबी की डिग्री हासिल की।

जिसके बाद बार काउंसिल ऑफ हिमाचल प्रदेश ने लग्नेश का पंजीकरण किया। इसी के साथ 33 वर्षीय लग्नेश कानून की पढ़ाई कर हिमाचल के पहले नेत्रहीन अधिवक्ता बने हैं। अभी वह घुमारवीं सिविल कोर्ट में वकालत कर रहे है।

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18 साल पहले गई थी आंखों की रोशनी
बताते चलें कि तकरीबन 18 साल पहले यानी 2009 में उन्हें अचानक से आंखों में संक्रमण हो गया। धीरे-धीरे यह संक्रमण इस कदर बढ़ गया कि उन्हें दिखना ही बंद हो गया। हालांकि उन्होंने कई बड़े अस्पतालों में इसका इलाज भी करवाया, मगर फिर भी उन्होंने हमेशा के लिए अपनी आंखों की रोशनी को खो दिया।

मां ने नहीं टूटने दिया हौसला
अग्नेश के सिर से पिता का साया पहले ही उठ चुका था, ऐसे में परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो गई थी। बावजूद इसके माँ ने बेटे के हौसले को कभी टूटने नहीं दिया और आंगनवाड़ी में बतौर हेल्पर कार्य करते हुए बेटे को पढ़ाया-लिखाया और आज इस काबिल बनाया।

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Written by News Ghat

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