Gandhi Talks Movie: बिना संवाद की फिल्म लेकिन फिर भी असरदार! जानिए क्या है गांधी टॉक्स की कहानी
Gandhi Talks Movie: बॉक्स ऑफिस पर मर्दानी 3, मायासभा -द हॉल का इल्यूजन के साथ-साथ एक विशिष्ट फिल्म रिलीज हुई है जिसका नाम है गांधी टॉक्स। यह फिल्म एकदम हटके और अनोखी फिल्म है, क्योंकि इस फिल्म में कोई डायलॉग नहीं है। जी हां, आपने एकदम सही सुना यह एक अनूठा प्रयोग है।

Gandhi Talks Movie: बिना संवाद की फिल्म लेकिन फिर भी असरदार! जानिए क्या है गांधी टॉक्स की कहानी
इस फिल्म में कोई डायलॉग, कोई संवाद नहीं है। केवल दृश्य, भाव और संगीत के जरिए इस फिल्म को बनाया गया है और यह फिल्म एक अलग एक्सपेरिमेंट मानी जा रही है। हैरान करने वाली बात है इस फिल्म का नाम गांधी टॉक्स है। मतलब नाम में टॉक्स जरूर है लेकिन फिल्म में केवल खामोशी है।

इस फिल्म में ना महात्मा गांधी हैं और ना कोई संवाद लेकिन फिर भी यह फिल्म एक गहरी छाप छोड़ जाती है। आज सोशल मीडिया और मेन स्ट्रीम मीडिया में इसी फिल्म की चर्चा है क्योंकि यह फिल्म काफी लंबे समय के बाद बॉलीवुड में किया गया एक एक्सपेरिमेंट है।


क्यों है गांधी टॉक्स एक अलग एक्सपेरिमेंट
एक समय था जब भारत में मूक फिल्में ही बनती थी जी हां, 1913 से 1931 तक भारत में बनी सारी फिल्में बिना डायलॉग के होती थी। उसके बाद 1987 में एक और फिल्म पुष्कर आई जो अपने आप में अनूठा एक्सपीरियंस थी। इस फिल्म में कमल हसन थे। अब एक लंबे समय बाद गांधी टॉक्स एक क्लासिक फार्मूले से हटकर पूरी तरह एक साइलेंट फिल्म है।
जिसका उद्देश्य भाषा तक सीमित न रहना बल्कि अनकही भावनाओं से दिल की बात कहना है। यह साइलेंट फ़िल्म भारत के इतिहास की धरोहर है। फिल्म में ए आर रहमान ने संगीत दिया है और फिल्म का कैमरा और निर्देशन इस तरह किया गया है की डायलॉग ना होने के बावजूद भी आपको लगेगा नहीं की फिल्म में कुछ मिसिंग है।

क्या है गांधी टॉक्स की कहानी
गांधी टॉक्स फिल्म मुंबई की पृष्ठभूमि पर बनाई गई है। इस फिल्म में विजय सेतुपति एक आम आदमी महादेव का किरदार निभा रहे हैं जो एक बेहतर नौकरी की तलाश में है और अपनी बीमार मां की देखभाल कर रहे हैं। मूवी में दिखाया गया है कि किस प्रकार जिंदगी का संघर्ष और उम्मीद के बीच वह झूल रहा है।
मूवी में अरविंद स्वामी एक बिजनेसमैन का किरदार निभा रहे हैं जो सफल बिल्डर है जिसके पास पैसे की कोई कमी नहीं लेकिन परिस्थितियों में फंसा यह आदमी भी टूट जाता है। फिल्म में विजय सेतुपति की लेडी लवआदित्य राव हैदरी बनी हैं। साथ में इस फिल्म में है सिद्धार्थ जाधव, महेश मांजरेकर और उषा नांदकर्णी।
क्या है फिल्म का सामाजिक मैसेज
यह फिल्म असल में गांधी के विचारधाराओं पर बनी हुई है। किस प्रकार भारत के समाज में नैतिकता, भ्रष्टाचार ,दरिद्रता और विभिन्न प्रकार की अवधारणाएं बसी है और उनकी वजह से किस प्रकार एक आम आदमी को अलग-अलग मुसीबत से जूझना पड़ता है। यह फिल्म पैसे सत्ता और संघर्ष के बीच मानवीय संवेदनाओं को दिखाती है। फिल्म कर्मों और कर्मों के फल दोनों पर बात करती है। इसीलिए इस फिल्म में डायलॉग नहीं रखा गया ताकि दर्शक किरदारों की आंखों, उनकी भावनाओं को समझें।
निष्कर्ष
फिल्म को दर्शकों और समीक्षको का मिला-जुला रिस्पांस मिल रहा है। कुछ लोग इस फिल्म को नया एक्सपेरिमेंट बता रहे हैं, तो कुछ लोग इस फिल्म को महसूस करने वाली मूवी कह रहे हैं। कुछ को बिना डायलॉग की यह फिल्म समझ में ही नहीं आई। हालांकि यह फिल्म हमारे भारतीय सिनेमा की विरासत है जो आज की भागम-भाग में खामोशी से आपके दिल तक पहुंच जाएगी।
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