Success Story: पारंपरिक शाॅल बुनाई की कला को जीवित रखे हुए हैं हिमाचल के रामलाल! 14 से 15 हज़ार तक बिक रहा एक शॉल

Success Story: आज के दौर में जब अधिकतर युवा आधुनिक रोजगार और तकनीकी क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, तब खड्डी (हैंडलूम) जैसी पारम्परिक कलाओं को समझने और सीखने वाले लोगों की संख्या लगातार घटती जा रही है। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में खड्डी की आवाज सुनाई देती थी और यह कई परिवारों के जीवनयापन का मुख्य साधन हुआ करती थी।

Success Story: पारंपरिक शाॅल बुनाई की कला को जीवित रखे हुए हैं हिमाचल के रामलाल! 14 से 15 हज़ार तक बिक रहा एक शॉल
लेकिन समय के साथ नई पीढ़ी का रुझान इस कला से कम हो रहा है, जिसके कारण आज खड्डी की वह परिचित आवाज हमारे ग्रामीण परिवेश से लगभग लुप्तप्राय होती जा रही है। लेकिन ऐसे समय में कुछ गिने चुने लोगों में से जिला कांगड़ा की तहसील पालमपुर के गांव डराटी के निवासी रामलाल भी पिछले करीब तीन से साढ़े तीन दशकों से पारंपरिक शाॅल बुनाई की कला को जीवित रखने का काम कर रहे हैं।

सीमित संसाधनों के भी उन्होंने अपनी मेहनत और लगन के बल पर इस पारंपरिक कला को न केवल सीखा बल्कि आज भी इसे पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। रामलाल बताते हैं कि घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, इसलिए कम उम्र में ही उन्हें काम सीखने और परिवार का सहारा बनने की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। इसी दौरान उन्होंने पारंपरिक शाॅल बुनाई की कला सीखने का निर्णय लिया।


इस कला की शुरुआत उन्होंने देवभूमि स्पिनिंग मेला, कुल्लू से की, जहां उन्होंने शाल बुनाई के शुरुआती गुर सीखे। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग जगहों पर काम करते हुए और अनुभवी कारीगरों के साथ समय बिताकर इस कला में महारत हासिल की। वर्षों के अनुभव के साथ उन्होंने न केवल तकनीक सीखी बल्कि पारंपरिक डिजाइनों और पैटर्न को भी समझा। अपने अनुभव के दौरान रामलाल ने चंबा की एक कंपनी में लगभग दो वर्षों तक प्रशिक्षण भी दिया।
वहां उन्होंने कई युवाओं और महिलाओं को शाल बुनाई का काम सिखाया। यह उनके लिए गर्व की बात है कि उनके सिखाए हुए कई लोग आज भी इस काम से अपना जीवनयापन कर रहे हैं। बाद में जब उन्होंने वहां से काम छोड़ा तो अपने स्तर पर यह काम फिर से शुरू किया। रामलाल बताते हैं कि अपनी मेहनत और धैर्य के साथ उन्होंने धीरे-धीरे अपने काम को आगे बढ़ाया।


आज भी वह पारंपरिक तरीके से शाॅल और ऊनी कपड़े तैयार करते हैं। रामलाल बताते हैं शॉल बनाने की प्रक्रिया काफी कठिन और समय लेने वाली होती है। इसमें ऊन लाने से लेकर उसे साफ करने, धागा बनाने, रंगाई, बुनाई और डिजाइन तैयार करने तक कई चरण होते हैं। हर चरण में विशेष कौशल और धैर्य की जरूरत होती है। एक शाॅल तैयार करने में कई दिन लग जाते हैं।
एक शाॅल के लिए लगभग 5 से 6 मीटर कपड़ा लगता है और इसमें बेहद सटीकता की आवश्यकता होती है। रामलाल पारंपरिक कुल्लू और किन्नौरी डिजाइनों में शाॅल तैयार करने में माहिर हैं। इसके अलावा वह अलग-अलग डिजाइन के सूट के कपड़े भी तैयार कर सकते हैं। उनका कहना है कि बाजार में उनके जैसे पारंपरिक तरीके से बने शाॅल 14 से 15 हजार रुपये तक में बिकते हैं, क्योंकि इसमें पूरी तरह हाथ की मेहनत और कला शामिल होती है।
रामलाल के अनुसार उन्हें इस काम से बहुत लगाव है और वह चाहते हैं कि यह पारंपरिक कला आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचे। रामलाल 2 से 4 मशीनें लगाकर एक छोटा प्रशिक्षण केंद्र शुरू करना चाहते हैं। इसके माध्यम से वह गांव और आसपास के क्षेत्रों के बेरोजगार युवाओं को यह काम सिखाना चाहते हैं, ताकि उन्हें रोजगार मिल सके और पारंपरिक बुनाई की यह कला भी सुरक्षित रह सके।
वह बताते हैं कि शाल बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल (ऊन) वह मुख्य रूप से कुल्लू से लेकर आते हैं। जो शाॅल और कपड़े वह स्थानीय स्तर पर बेच पाते हैं, उन्हें यहीं बेच देते हैं और बाकी तैयार माल शाॅल व्यापारियों को दे देते हैं। रामलाल पारम्परिक के साथ-साथ नए डिजाइन और पैटर्न पर भी काम करना चाहते हैं। वह उम्मीद रखते हैं कि यह हुनर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में उन्हें कामयाबी मिलेगी।

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