सिरमौर का बेटा स्टैनफोर्ड में चमका! अब सैटेलाइट तकनीक से बचाएगा हिमाचल के जंगल और जल-स्रोत

सिरमौर: हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के एक युवा ने अपनी मेहनत और शोध के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है। खोदरी माजरी गांव के रहने वाले ऋषुध ठाकुर इस समय अमेरिका के प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रहे हैं। उनका शोध जलवायु परिवर्तन, जंगलों और जल-स्रोतों के संरक्षण के लिए सैटेलाइट डेटा के उपयोग पर आधारित है। उनकी उपलब्धि से पूरे प्रदेश में खुशी का माहौल है।
ऋषुध का बचपन प्रकृति के बीच बीता। हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा पर बसे उनके गांव के आसपास नदियां, पहाड़ और जंगल हैं। यही वातावरण उन्हें बचपन से पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाता रहा। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान उन्होंने प्राकृतिक आपदाओं को करीब से समझने की कोशिश की और इसी दौरान सैटेलाइट तकनीक के जरिए बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने की दिशा में काम शुरू किया।
बाद में उन्होंने जंगलों की विभिन्न प्रजातियों और उनमें कार्बन भंडारण का अध्ययन करने के लिए आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया। उच्च शिक्षा के लिए वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय पहुंचे, जहां उन्होंने पर्यावरण इंजीनियरिंग में मास्टर्स किया। पढ़ाई के दौरान उन्हें अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा में भी शोध करने का अवसर मिला। वहां उन्होंने सैटेलाइट डेटा की मदद से कृषि और सिंचाई से जुड़े विषयों पर काम किया।


वर्तमान में ऋषुध स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के जियोफिजिक्स विभाग में पीएचडी कर रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों के जरिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन करना और जैव विविधता के संरक्षण के लिए बेहतर समाधान विकसित करना है।
हाल ही में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी हैं। उन्हें उत्कृष्ट शिक्षण के लिए विश्वविद्यालय का प्रतिष्ठित शिक्षण सम्मान दिया गया है। इसके अलावा उन्हें डोर स्कूल ऑफ सस्टेनेबिलिटी की एडवाइजरी काउंसिल में छात्र प्रतिनिधि चुना गया है। इस काउंसिल में दुनिया के कई उद्योगपति, वैज्ञानिक और वैश्विक स्तर के विशेषज्ञ शामिल हैं। अब ऋषुध छात्रों के सुझाव और विचार विश्वविद्यालय के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाएंगे।

ऋषुध का मानना है कि सैटेलाइट तकनीक भारत जैसे विशाल देश के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। इससे कम समय और कम खर्च में जंगलों, जल-स्रोतों और पर्यावरण की निगरानी की जा सकती है। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है और इनके संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है।
पीएचडी पूरी करने के बाद ऋषुध भारत लौटकर हिमाचल में शोध कार्य करना चाहते हैं। उनका सपना है कि स्थानीय लोगों को भी पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक शोध से जोड़ा जाए। उन्होंने प्रदेशवासियों से अपील की है कि जंगलों, नदियों और जल-स्रोतों की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है। अपनी सफलता का श्रेय उन्होंने अपने माता-पिता और शिक्षकों को दिया, जिनके मार्गदर्शन और सहयोग ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।


